भोपाल/ इंदौर
एमपी में हफ्ते भर में नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति हो सकती है। सीएम डॉ. मोहन यादव और बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के बीच मंथन पूरा हो चुका है। संभवत: इसी हफ्ते में बचे हुए निकायों में एल्डरमैन घोषित करने की तैयारी है। प्रदेश के करीब 244 नगरीय निकायों में मनोनीत पार्षदों यानी एल्डरमैन की नियुक्ति होना बाकी है।
नगर निगमों में नियुक्त होंगे एल्डरमैन एमपी के 16 नगर निगमों में 12-12 एल्डरमैन नियुक्त किए जाएंगे। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर जबलपुर सहित सभी नगर निगमों के एल्डरमैन के लिए संभावित नामों की लिस्ट जिला स्तरीय कोर ग्रुप में चर्चा के बाद प्रदेश संगठन को भेजे जा चुके हैं। दो बडे़ शहरों में कुछ नामों पर चर्चा अंतिम दौर में है।
इन नगर निगमों में नियुक्त होंगे मनोनीत पार्षद
भोपाल
इंदौर
जबलपुर
ग्वालियर
उज्जैन
सागर
रीवा
सतना
सिंगरौली
मुरैना
छिंदवाड़ा
देवास
कटनी
रतलाम
खंडवा
बुरहानपुर
मार्च में 169 निकायों में नियुक्त हुए थे एल्डरमैन
मार्च में मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य के 169 नगरीय निकायों में एल्डरमैन की नियुक्ति के आदेश जारी किए थे। इन नियुक्तियों में विशेष रूप से नगर परिषदों और नगर पालिकाओं को कवर किया गया था, जिसका विवरण इस प्रकार है।
नगर परिषद: एमपी में कुल 299 नगर परिषद हैं। इनमें से 28 मार्च को 123 नगर परिषदों में एल्डरमैन नियुक्त किए गए थे। तय फॉर्मूले के मुताबिक, प्रत्येक नगर परिषद में 4-4 एल्डरमैन मनोनीत किए गए। इस लिहाज से नगर परिषदों में कुल 492 एल्डरमैन बनाए गए थे। अब 176 नगर परिषदों में नियुक्तियां होना बाकी हैं।
नगर पालिका: एमपी में कुल 98 नगर पालिका परिषद हैं। इनमें से मार्च में 46 नगर पालिकाओं में एल्डरमैन की घोषणा की गई थी। यहां के लिए प्रति नगर पालिका 6-6 एल्डरमैन का फॉर्मूला तय किया गया था, जिससे नगर पालिकाओं में कुल 276 एल्डरमैन नियुक्त हुए। अब 52 नगर परिषदों में एल्डरमैन नियुक्त होने बाकी हैं।
यदि दोनों को जोड़कर देखा जाए, तो मार्च में हुई घोषणा के तहत कुल 768 एल्डरमैन नगर परिषद और नगर पालिका में नियुक्त किए गए थे। हालांकि, उस समय आपसी सहमति न बन पाने के कारण सागर को छोड़कर शेष बुंदेलखंड और चंबल संभाग के कई निकायों की सूची होल्ड पर रख दी गई थी।
क्या होती है एल्डरमैन की भूमिका?
मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम के तहत नगरीय निकायों में ऐसे लोगों को एल्डरमैन बनाया जाता है, जिन्हें प्रशासनिक अनुभव और नगरीय निकायों के कामकाज का अच्छा ज्ञान हो। ये मनोनीत पार्षद परिषद की बैठकों और चर्चाओं में हिस्सा तो ले सकते हैं और अपने सुझाव भी दे सकते हैं।
इनके पास बैठकों के दौरान वोट देने का अधिकार नहीं होता है। यानी ये परिषद में 'मार्गदर्शक' की भूमिका निभाते हैं, 'निर्णायक' की नहीं। इनका कार्यकाल वर्तमान परिषद के कार्यकाल के साथ या आगामी आदेश तक प्रभावी रहता है।


